Ageya

अज्ञेय जी  के साथ का एक दिन --


        डा० सुधाकर तिवारी, कुशीनगर


जब एक नेता  का अहंकार साहित्यकार अज्ञेय के शालीन व्यवहार और मौन से हार गया था ।


बात 1976 मार्च की है । इस घटना के 49 साल बीत गये हैं । पर मानस‌ पटल से यह घटना भूलती नहीं । अज्ञेय के 65वें जन्मदिन को मनाने की तैयारी कुशीनगर में चल रही थी। इसे अरुणेश नीरन जी के अथक प्रयास से आयोजित किया गया था ।


सभी लोग सहकारी व्यवस्था में जुट गए थे। कहीं से ईंट कहीं से रोड़ा  लेकर कार्यक्रम का कुनबा तैयार किया गया। आकाशवाणी ने कार की व्यवस्था कर दी,  गोरखपुर से लेकर कुशीनगर, देवरिया के साहित्यकारों , प्राध्यापको ने आवास आदि की व्यवस्था कर दिया , पी जी कॉलेज कुशीनगर ने निःशुल्क अपना हॉल दे दिया। कुछ लोगों ने भोजन का जिम्मा लिया। मार्ग-व्यय की व्यवस्था करनी नहीं थी, क्योंकि सभी लोग अपने संसाधनों से आ रहे थे। 


सहयोग माँगने सब लोग प्रदेश के  वरिष्ठ कांग्रेसी नेता राजमंगल पाण्डेय के घर कसया गए और अनुरोध किया कि कार्यक्रम के बाद वे सबको जलपान कराने की व्यवस्था कर दें। वे सहर्ष तैयार हो गए, लेकिन उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि वह आयोजन कुशीनगर के समारोह-स्थल पर नहीं, उनकी कोठी के लॉन पर होगा। उन्होंने यह भी कहा कि वह प्रस्तावित अज्ञेय संस्थान के लिए वे दस हजार रूपए की सहयोग राशि भी देंगे। 


7 मोर्च को सभी लोग जुटे। बड़ी बहन सत्यवती जी ने वह स्थान दिखाया जहाँ वह शिविर लगा था और जिसमें 7 मार्च सन् 1911 को अज्ञेय का जन्म हुआ था। सभी ने वहाँ शाल के एक-एक पौधे को रोपा, फिर मुख्य कार्यक्रम के लिए हॉल में पहुँचे। अज्ञेय ने चतुर्वेदी जी और बड़ी बहन के चरण-स्पर्श किए और कार्यक्रम आरंभ हुआ। अज्ञेय की बगल में बैठे विद्यानिवास जी ने घोषणा की कि भाषण केवल उन्हीं का होगा, जो कवि नहीं हैं, जो कवि है वे काव्य-पाठ के द्वारा आदरांजलि देंगे। केदार जी, परमानंद श्रीवास्तव, भवानी भाई, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, विश्वनाथ पाण्डेय राहगीर, अनंत मिश्र ने अपनी कविताएँ सुनाई, बाकी ने अज्ञेय के कवि-कर्म और व्यक्तित्व पर व्याख्यान दिए, चतुर्वेदी जी ने आशीर्वाद दिया और अज्ञेय के भाव विभोर होकर दिए गए आभार के बाद कार्यक्रम समाप्त हो गया।


इसके बाद राजमंगल पाण्डेय  की कसया स्थित कोठी पर आना था जलपान के लिए। हम लोग बाहर निकले तो आकाशवाणी की कार नहीं थी। वह कार जुगानी भाई लेकर किसी आवश्यक कार्य से गोरखपुर जा चुके थे ।उसी से तीन कि.मी. दूर राजमंगल पाण्डेय की कोठी में पहुँचना था। विवश होकर सर सुरेन्दर सिंह मजीठिया जी से अनुरोध किया  जाए कि वे अपनी मर्सिडीज से तीन-चार खेप में सबको वहाँ पहुँचा दें। यह विचार सामने आया । चौरासी वर्षीय मजीठिया जी से यह अनुरोध करते हुए सबको संकोच हो रहा था, लेकिन कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था। अन्त में नीरन जी ने ही सुरेन्दर सिंह मजीठिया जी से यह प्रस्ताव रखा ।


मजीठिया जी ने प्रसन्नता से प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और पहली खेप में अज्ञेय जी , भवानी भाई, विद्यानिवास मिश्र को स्वयं लेकर कसया पहुँचे, राजमंगल पाण्डेय की कोठी पर। चार-पाँच चक्कर में सब पहुँच गए।


राजमंगल पाण्डेय की कसया स्थित कोठी पर लॉन में बड़े करीने से जलपान की व्यवस्था की गई थी। जब सब लोग बैठ गए, नाश्ता लग गया तो राजमंगल पाण्डेय ने अज्ञेय जी से अनुरोध किया कि 'वात्स्यायन जी, शुरू करें।'


अज्ञेय जी बहुत गंभीर थे। न उन्होंने राजमंगल पाण्डेय की ओर देखा, न नाश्ता शुरू किया। अनुरोध बार-बार दुहराया गया। अज्ञेय जी चुप्प तो चुप्प। अचानक वे खड़े हो गए और धीरे से कहा, 'चलिए, बाहर चलें । यह कहकर वह वह उठ खड़े हुए । 


अज्ञेय जी के साथ ही सब उठ खड़े हुए - बिना एक कण किसी भी व्यंजन का छुए। राजमंगल पाण्डेय  स्तब्ध थे । लगता था उनको सॉंप सूॅंघ गया है । हम सब भी स्तब्ध थे ।


बाहर आकर उन्होंने कहा, 'चलिए, किसी दुकान में जलपान किया जाए।'


 कवि-कथाकार और उस समय वहाँ के एस.डी.एम. राजेंद्र प्रसाद पांडेय साथ में ही थे। उनको मैं चाचा जी की संज्ञा से सम्बोधित करता था ।उन्होंने कहा, 'बगल में उनका घर है, वहीं जलपान हो।' हम सब अज्ञेय की मौन सहमति पाकर उनके आवास में चले गए। राजेंद्र जी पाण्डेय का परिवार उस समय नहीं था। अज्ञेय के प्रस्ताव पर सबने मिलकर नाश्ता बनाया। इलाजी, ओमवतीजी रसोई में गई, अज्ञेय के नेतृत्व में लोगों ने आलू काटा, मटर के दाने निकाले, धनिया की पत्ती तैयार की और समूह-भोज का आनंद लिया गया । मैंने हॅंसते हुए कहा था कि जब कभी कुशीनगर का साहित्यिक इतिहास मैं लिखूॅंगा तब यह उसके पन्नों में जरूर अंकित करूॅंगा कि अज्ञेय जी सहित हिन्दी साहित्य के अनेक शीर्षस्थ साहित्यकारों को कुशीनगर में मैंने पकौड़ा तलते और सब्जी काटते देखा है।


दूसरे दिन अज्ञेय जी ने नीरन जी को अपने कमरे में बुलाया और कहा, 'मेरे नाम पर बननेवाले संस्थान के लिए उस नेता के द्वारा दी जानेवाली जिस सहयोग राशि की आप चर्चा कर रहे थे, वह आप नहीं लेंगे। इसकी सूचना आप उन्हें दे दें।'


'आप नहीं चाहते हैं तो वह सहयोग राशि हम नहीं लेंगे। लेकिन कल आप जलपान की टेबल से उठ क्यों गए? बहुत बुरा माना होगा उन्होंने।' नीरन जी ने प्रश्न किया ।


'मानने दें। जो आदमी अपने घर आए बुजुर्ग का सम्मान नहीं कर सकता, उसके यहाँ जलपान कैसे किया जा सकता है?' इतना कहकर अज्ञेय जी मौन हो गए।


नीरन जी भवानी भाई के पास गये, यह पूछने कि, 'जब पहली खेप में वे अज्ञेय के साथ पहुँचे तो हुआ क्या था? क्या उनका या अज्ञेय जी का अपमान किसी ने कर दिया?


'अरे, नहीं भैया! वह हम लोगों का अपमान क्या करेगा? तुमने जिस कार में हम लोगों को भेजा था, वहाँ उतरते ही वह आदमी वयोवृद्ध मजीठिया साहब से कहा-सुनी करता रहा। उसने यह भी कह दिया कि आप अज्ञेयजी के बहाने हमारे परिसर में कैसे आ गए? मजीठिया साहब तो सज्जन आदमी है, सुनकर मुस्कराते रहे, लेकिन भाई गंभीर हो गए। तभी मुझे लग गया कि कुछ-न-कुछ होकर रहेगा। वही हुआ भी।' भवानी भाई ने नीरन जी को बताया ।

नीरन जी की ऑंखें डबडबा गईं थी । उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे खींचते हुए लेकर बुद्ध की मूर्ति के सामने पहुॅंचे और मूर्ति को स्पर्श करके कहा आज से किसी भी नेता को अपने मंच पर नहीं बुलाऊॅंगा , कभी कोई सरकारी सम्मान , पुरस्कार नहीं स्वीकार करूॅंगा और न ही किसी नेता से किसी प्रकार का सहयोग लूॅंगा ।अपने इस वचन का पालन नीरन जी ने आजीवन किया ।


अज्ञेय जी की शालीन सामाजिकता और गहरी संवेदना ने नेताजी के अशालीन व्यवहार को अपने मौन से जो उत्तर दिया, उससे हम अवाक थे। अपने प्रति व्यक्त किए जा रहे सम्मान का उनके लिए कोई अर्थ नहीं था। उनकी भावभूमि कठोर यथार्थ और उतने ही कठोर आदर्श के बीच झूला झूलनेवाली भावभूमि थी।


कमेंट


इतना नहीं हुआ, जितना आपको बताया गया है। मजीठिया के साथ जब लोग राजमंगल पाण्डेय जी के आवास पर गए और बड़े सम्मान पूर्वक बैठाए गए। पांडेय जी बाहर निकले तो मजीठिया को देखते ही उखड़ गए और उसे डांटने लगे और कहा,"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे घर आने की, अभी निकलो यहां से... गेट आउट यू चोट्टा ।" मजीठिया बाहर जाकर अपनी गाड़ी के पास खड़ा हो गया। पांडेय जी ने सम्मान पूर्वक अज्ञेय जी से चाय पीने को कहा। अज्ञेय जी ने मना कर दिया और कुछ मिनट चुपचाप बैठे रहने के बाद विदा ले लिया। पांडेय जी विद्वानों का बहुत सम्मान करते थे। उन्होंने विद्वानों के सम्मान में कोई कमी नहीं की। लेकिन वह मजीठिया से इसलिए नाराज थे कि उसने अपनी शुगर मिल बिना किसी नोटिस के बंद कर दिया और पांडेय जी से वादा करने के बावजूद किसानों के गन्ना का पैसा और मजदूरों के सर्विस फंड्स के करोड़ों रुपए दबा लिए और कभी नहीं दिया। पांडेय जी ने भी शपथ ले ली कि उसकी पूर्वांचल से विदाई कर देंगे। और उन्होंने सरदार नगर शुगर मिल से अधिक क्षमता वाली आधुनिक शुगर मिल ढाड़ा हाटा में लगाने के लिए केके बिरला समूह को आमंत्रित किया। मामला बहुत लंबा है। बस इतना समझिए कि पांडेय जी के मरने के बाद भी बिरला समूह ने वादा निभाया और मिल लगाया। सरदार ने रोकने के लिए रिटें दाखिल किया। लेकिन हार गया। और पूर्वांचल से मजीठिया की विदाई हो गई।

–पांडेय जी साहस की प्रतिमूर्ति थे। वह लखनऊ से अपनी मारुति 800 से कसया आ रहे थे, साथ में उनके मित्र और समर्थक पंडित अनिरुद्ध शुक्ल जी भी थे। रास्ते में बस्ती से थोड़ा आगे पूर्वांचल के एक शेर (अब स्वर्गीय) अपनी पचास गाड़ियों और समर्थकों के साथ लखनऊ जाते हुए मिल गये। पांडेय जी ने अपनी कार रुकवाई, नीचे उतरकर उन्हें बुलाया और उनकी फजीहत कर दिया। और धमकी दी,"अगर आगे फिर ऐसा हुआ तो मिट्टी में मिल जाओगे।" शेर जी हाथ जोड़े चुपचाप सुनते रहे। फिर पांडेय जी गाड़ी में बैठे और चल दिए। रास्ते में पंडित अनिरुद्ध शुक्ल जी उन्हें गालियां देने लगे - तुम साले सबको मरवाओगे...! पांडेय जी निस्पृह भाव से सुनते रहे।

–भले कोई कुछ भी कहे, लेकिन पांडेय जी अपने समय में निर्विवाद रूप से पूर्वांचल के सबसे बड़े नेता थे। उनके हृदय में गरीबों के लिए स्थान था। कुर्ता-पायजामा-चप्पल और जाड़े में एक शाल...। उन्होंने अपने लिए जो कुछ किया, अपनी वकालत की कमाई से किया।


                        

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