मूस के चाल्हाकी
एगो रहे मूस। मूसन के बिरादरी में ऊ अपना के सभसे चतुर बूझत रहे। ऊ सोचलस, बिरादरी से बहरी जाके घूमे फिरे के मजे किछु अउर होई। फेरु का रहे! अगिले दिने ऊ सैर करे खातिर निकलि परल।
चलत-चलत मूस के भूखि लागि गइल। थाकल-खेदाइल ऊ एगो लकड़ी के टाल में सुस्ताए लागल। तलहीं ऊ देखलस, थोरहीं दूर प दूगो वैपारी आटा सानिके लिट्टी लगावे के तेयारी करत रहलन स।
मूस तुरुन्ते उहां जा पहुंचल। ऊ कहलस, 'बैपारी भाई जी ! लिट्टी लगावे खातिर जदी हम लकड़ी ले आके दीं, त का रउआं सभी कबूल करब?'
'अरे भाई, नेकी आ पूछ-पूछ ! हमनीं के त लकड़िए खातिर फिकिरंत बार्नी जा। तू ले आ दऽ, त बड़ा मेहरबानी होई!' बैपारी बोलल ।
मूस एक-एक कऽके लकड़ी ले आ दिहलस। वैपारी खुश भइलन। दूनों लिट्टी लगवलन से। मूस उहंवे बइठल रहल। वेर-वेर ओकरा मुंह में पानी भरि आवत रहे।
लिट्टी लगाके जब ऊ दूनों बैपारी खाए बइठलन स, त ऊ दूनों मूस से कहलन स- 'मूस भाई, अब काहें बइठल बाड़ऽ? जात काहें नइखऽ?'
मूस जरि-भुनि गइल। कतना सवारथी बा ई लोग! हम जंगल से लकड़ी ले आके दिहलीं। ओही लकड़ी के बदउलत लिट्टी तेयार भइल... आ हम एगो लिट्टियों से गइलीं? आखिर ऊ कहिए दिहलस ।
वन गइलीं, वन-काठी ले अइली, ऊ काठी हम तोहके दिहलीं, ऐ मूस ! ए मूस ! जा ना ! का हम एगो लिट्टियो से गइलीं?
ना भाई ! अइसन का बात बा! कहत बैपारी एगो लिट्टी दे दिहलस। लिट्टी पाके मूस बहुते खुश भइल। मिलत कहीं लिट्टी कि ओकर भूखि हो गइल खतम। लिट्टी लेके ऊ थोरिकिए दूर आगा बढ़ल रहे कि ऊ एगो भड़भूजा वाला गोंड़ के लरिका के भूखि से रोवत देखलस। गोंड़ का लगहीं भूजे खातिर अनाज राखल रहे। मूस भड़भूजा वाला से कहलस- 'गोंड़ भाई ! जदी तू कहऽ, त हम तहरा लरिका के खाए खातिर एगो लिट्टी दे दीं?'
'बहुत मेहरबानी होई, भाई!' गोंड़ कहलस।
मूस लरिका के लिट्टी दे दिहलस। ऊ रोवल भुलाके लिट्टी खाए लागल। मूस भड़भूज वाला का लगे चुपचाप बइठि गइल।
जब ढेर देरी हो गइल, त गोंड पुछलस 'मूस भाई! अब काहें वइठल बाडऽ?'
मूस सोचे लागल- 'हम जंगल के खाक छानिके लकड़ी जुटवलीं। लकड़ी दिहला प एगो लिट्टी मिलल। ओह लिट्टी के हम गोंड़ के लरिका के दिहलीं। बाकिर ई हमरा के खालिए हाथ भगावल चाहत बा। का हम एक मुट्ठी दनवों से गइलीं?' मूस भड़भूजा वाल से कहलस।
वन गइलीं, वन-काठी ले अइलीं, ऊ काठी बैपारी के दिहली, बैपारी एगो लिट्टी दिहलन, ऊ लिट्टी तहर लरिका के दिहलीं, ऐ मूस ! एक मूस ! जा ना, का हम एक मुट्ठी दनवों से गइलीं?
गोंड (कानू) लजाके कहलस 'ना मूस भाई! अइसन हम कब कहीं हां? एक मुट्ठी दाना लऽ !'
दाना लेके मूस खुशी-खुशी आगा बढ़ल। तलहीं ऊ देखलस, एगो कोंहार चाक प माटी के बरतन बनावत रहे आ बगल में खाड़ ओकर लरिका रोवत रहे।
मूस के दया आ गइल आ ऊ कोंहार से पुछलस'का हम तहरा रोवत लरिका के खाए खातिर दाना दे दीं?'
'बहुत किरिपा होई, मूस राजा!' कोंहार खुश होके बोलल ।
मूस लरिका के दाना दे दिहलस। लोर पोंछत लरिका दाना खाए लागल। मूस कोंहार का लगे बइठि गइल।
जब ढेर देरी ले मूस बइठले रहि गइल, त कोंहार ओकरा के जाए के कहलस।
मूस सोच-विचार करे लागल 'हम वन से वन-काठी चुनलीं । बैपारी से लकड़ी देके लिट्टी लिहलीं। कानू के लरिका के लिट्टी देके दाना मंगलीं। एह कोंहार के लरिका के दाना देके चुप कर वलीं। खानी हाथ टरकावल चाहत बा। का हम एगो घूंचों से गइली?' मूस बोलल।
वन गइलीं, वन-काठी ले अइलीं, ऊ काठी बैपारी के दिहली, बैपारी एगो लिट्टी दिहलस, ऊ लिट्टी हम गोंड़ के दिहलीं, गोंड़ हमके दाना दिहलस, ऊ दाना तहरा लरिका के दिहली, ए मूस ! ए मूस ! जाना। का हम एगो घूंचो से गइलीं?
'ठीक बा, मूस भाई ! तू हमरा लरिका के मन रखलऽ हम तहार मन राखत बानीं।' कहिके कोंहार एगो घूंचा देके मूस के विदा कइलस।
आगा बढ़ला प मूस देखलस, एगो अहीर पनहिए में गाय दुहत रहे। मूस पुछलस- 'का भाई, तहरा लगे गाय दुहे खातिर घूंचा नइखे?'
'ना मूस भाई !' अहीर बोलल- 'का तू एगो घूंचा दे सकेलऽ?' 'काहें ना! राखि लऽ !' मूस घूंचा थम्हावत कहलस।
अहीर खुश होके घूंचा में दूध ढरलस। मूस उहंवें बइठल रहल। ढेर देरी ले जब ऊ टस से मस ना भइल, त अहीर ओकारा के जाए के कहलस। मूस वन से लकड़ी से लिट्टी, लिट्टी से दाना, दाना से घूंचा के कथा कहि सुनवलस। फेरु ऊ कहलस- 'का हम एगो पगारियो से गइलीं?'
वन गइलीं, वन-काठी ले अइलीं, ऊ काठी बैपारी के दिहली, बैपारी एगो लिट्टी दिहलस, ऊ लिट्टी हम गोंड़ के दिहली, गोंड़ हमें दाना दिहलस, ऊ दाना हम कोहरा के दिहली, कोहरा एगो घूंचा दिहलस, ऊ घूंचा हम तहरा के दिहलीं, ए मूस ! ए मूस ! जाना। का हम एगो पगारियो से गइलीं?
अहीर मूस के एगो पगरी दे दिहलस। पगरी लेके मूस आगा बढ़ल । आगा एगो ताल रहे। ताल में किछु लरिकी लंगटे नहात रहली स। मूस कहलस- 'का तहन लोग का लगे पहिरे के बहतर नइखे ?'
ऊ लोग कहल, 'ना!'
'अगर हम दीं, त लेवू लोग?' मूस सवाल कइलस।
'काहें ना! बहुत मेहरबानी होई' लरिकी बोलली स।
मूस लमहर पगरी दे दिहलस आ कपड़ा फारि के बांटि लेबे के कहलस। लरिकी खुश को गइली स।
बाकिर मूस उहवां बइठलन, त फेरु जाए के नांवे ना लेत रहे। लरिकी जब जाए के कहली स, त ऊ लकड़ी से पगरी तक के कहनी कहि सुनवलस। फेरु लजात कहलस- 'का हम एगो लरिकियो से गइलीं?'
वन गइली, वन-काठी ले अइली, ऊ काठी बैपारी के दिहलीं, बैपारी एगो लिट्टी दिहलस, ऊ लिट्टी हम गोंड़वा के दिहलीं, गोंड़वा हमके दाना दिहलस, ऊ दाना हम कोहरा के दिहलीं, कोहरा एगो घूंचा दिहलस, ऊ घूंचा हम अहिरा के दिहलीं, अहिरा एगो पगरी दिहसल, ऊ पगरी हम तहनी के दिहलीं, ए मूस ! ए मूस ! जाना। का हम एगो लरिकियो से गइलीं?
लरिको दुखीमन से एगो लरिकी मूस के सउंपि दिहली स। लरिकी से संगे लेके मूस खुशी-खुशी घरे लवटल। अगल-बगल के मूस-मुसरी ओकरा के अचरज से देखऽ स। लरिकी दूनों जून खाना बनावे आ मूस बइठल-बइठल डटिके खाइ। बाकिर लरिकी मूस का संगे रहिके खुश ना रहे। ओकरा घर-परिवार के इयाद सतावे आऊ लुक छिप के रोवे लागे। मूस से मुकुती पावे के राह नजर ना आवत रहे।
एक रोज लरिकी रोटी पकावति रहे। ऊ आखिरी रोटी बेलि के तवा प राखि दिहलस आ पानी ले आवे नदी का ओर जाए लागलि। जात-जात ऊ मूस से कहलस- 'एक ओर पाकि गइला प तनी रोटी के उलाटि-दिहऽ । दिखिहऽ, जरे ना पावे ।'
लरिकी बहरी निकलले रहे कि मूस के रोटी जरला के महके आवे लागल। जइसहीं ऊ रोटी के उलाटे लागल कि खुद तवा प गिरि परल। तनिकिए देरी में छपिटात छपिटात ऊ जरिके मरि गइल।
जब लरिकी पानी लेके लवटलि, त ऊ मूस के तवा प झुलसि के मूवल पवलसि। मूस से मुकुती पाके ऊ बहुते खुश भइलि आ अपना घर का ओर चलि दिहलसि। बिरादरी के मूस जब मूवल मूस के देखलन स, त उन्हनों के बहुत दुख भइल। ऊ एक-दोसरा से कहे लगलन स- 'अपना लोगन से अलगा होखे वाला आ खुद के ढेर चाल्हाक बूझेवाला के इहे हाल होला।'
