Bhojpuri Folk Katha Kaha aur Gilahari

कउवा और गौरैया की कथा 
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ये भोजपुरी लोककथा मैने अपनी  बड़ी बहन श्रीमती उर्मिला द्विवेदी (पुत्री गीतकार श्री मोती बीए) से प्राप्त किया है । 
      -अंजनी कुमार उपाध्याय
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    एगो कउवा अउर एगो गौरैया रहले सनि। दोनों में खूब पटत रहे। दुनू मिल के एगो घर बनवले सनि। आपस मे तय भइल कि जेकर बच्चा पहिले होई ओके दुसरका खा जाइ। कउवा चालाक रहे। उ जानत रहे कि गौरया के बच्चा पहिले होई, आ हम के उ खाये के मिलि जाइ। 
     भईल उहे। गौरैया के बच्चा भईल। कउवा ओके मंगलसि। गौरया कहलसि जाके पहिले नदी में मुंह धो के आव।
 कउवा नदी के लगे गइल, आ कहलसि-
"नदियम नदियम नदियम"
नदी कहलसि-
"का बनारसी कउवा"
त कउवा कहलसि-
"दियो पनिल्ला, धोवब थोडील्ला, 
खाईब गौरैया क बच्चा"

नदी सोचलसि, ई त बड़ा दुष्ट बा। फेर कहलसि कि जा के माटी क गईली ले के आव, पानी के में हम  देई। 

कउवा कोहरे के लगे गइल, आ कहलसि-
"कोहरम कोहरम कोहरम"
कोहार कहलसि-
"का बनारसी कउवा"
त कउवा कहलसि-
"दियो घड़िल्ला भरब पनिल्ला, धोवब थोडील्ला, 
खाईब गौरैया क बच्चा"

कोहरा सोचलसि ई त बड़ा दुष्ट बा, आ कहि देलसि जा के माटी माँगि आव। 

कउवा माटी के लगे गइल, आ कहलसि-
"मटियम मटियम मटियम"
माटी कहलसि-
"का बनारसी कउवा"
त कउवा कहलसि-
"दियो मटिल्ला, बनी घडिल्ला, भरब पनिल्ला, धोवब थोडील्ला, तब खाईब गौरैया क बच्चा"
 
माटी कहलसि ई त बड़ा दुष्ट बा। बेचारी गौरैया के बच्चा के ई खा जाई। उ कहलसि जा के खुरपी लेले आव। 

कउवा लोहार के लगे गइल, आ कहलसि-
"लोहरम, लोहरम, लोहरम"
लोहार कहलसि-
"का बनारसी कउवा"
त कउवा कहलसि-
"दियो खुरप्पा, निकली मटिल्ला, बनी घडिल्ला, भरब पनिल्ला, धोवब थोडील्ला, तब
खाईब गौरैया क बच्चा"

लोहरा कहलसि ई त बड़ा दुष्ट बा । रुक एकरि आदति छोडावत बानी। उ आगी में खुरपी के खूब लाल के के ओकरी मोहे में दे दिहन। कउवा ओहि जु जरि के मर गइल आ चिरई के बच्चा के जानि बचि गइल।

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