Godah Nath Samosa ji

फूल के गहँकी


गोदहनाथ मिश्र ‘समोसा’ भोजपुरी के बिहड़ कवि हईं। महाकवि दूधनाथ शर्मा ‘श्याम’ के पटु शिष्य। उहें से भोजपुरी काव्य के बारीकी, लोक धारा के सत्व आ मजगर व्यंग्य कहे के कला सीखनी। ‘विचित्र-समोसा’ के जोड़ी के आधार स्तंभ। पेशा से शिक्षक। उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद के गाँव, सँवरेजी के रहिनियार। ‘समोसा’ जी, अपने काव्य के साथे-साथ अपने संवदेनशीलतो खातिर जानल गइनी। एगो अनाथ बालक के गोद लेइ के लालन-पालन कइनीं, पढ़वनीं-लिखवनी आ काबिल बनवनी। एकर चर्चा एहिजा एही से कर रहल बानी ताकि रउआ सभे के मालूम रहे कि ‘समोसा’ जी के संवेदना खाली काव्यगते ना रहे, बलुक ओकरे के उहाँ के अपने जीवन-व्यवहार में भी उतरनी। आजु गैरखेमाबाज कवियन के शृंखला के 42वीं कड़ी में समोसा जी के रचना, ‘फूल के गहँकी’ पऽ तनिका बातियावल जायी। इ रचना देखे भा सुने में बहुत सहज लागी। बाकिर एकरे में गूढ़ दार्शनिकतो छीपल बा। ‘फूल के गहँकी’ भोजपुरी साहित्य के एगो अमोल रचना हऽ। ‘मोना-मउनी’, में कहीं लुकाइल, रहल हऽ। एह रचना में सहजता, तीखा व्यंग्य, हास्य आ गहन दार्शनिकता के समन्वय बा। नतीजतन इ जनमानस में खास जगह बनवलस। एक दौर में खूब लोकप्रिय भइल। इ रचना सतही तौर पर सादा लाग सकऽतिया, बाकिर एकरे भीतर जिनगी के नश्वरता, माया के भ्रामक स्वरूप आ मानव स्वभाव के जटिलता के गहिराह पड़ताल भइल बा। मल्टी-लेयर, मल्टी डाइमेंशनल यानी बहुआयामी रचना बा। कवि ‘समोसा’ जी, अपने मारक व्यंग्य आ संवेदनशील व्यक्तित्व खातिर मशहूर भइनी। उहाँ के एह रचना में फूल के प्रतीक बनाके जिनगी के संपूर्ण यात्रा के चित्रित कइले बानी। मूल सनेस जिनगी के नश्वरता के लेके बाटे। तमाम इंतजाम के बादो एह जिनगी के फना होखहीं के बा। कवि ‘समोसा’ जी चेतावऽतानी, माया के फेरा में मति फँसीं। दास कबीर के भी इहे सीखावन रहे—‘माया महा ठगनी हम जानीं...’ कविवर समोसा फूल के बहाने जिनगी के पूरा यात्रा भा चरण के खोल के रखि दिहले बानी। कहे के ना होई कि समोसा जी मूलत: हास्य-व्यंग्य के कवि रहनी। बाकिर उहाँ के इ गीत ‘फूल के गहँकी’ अपने कथ्य, शिल्प, भाव आ संदर्भ के चलते गूढ़ दार्शनिक गीतन के कतार में राखऽल जा सकत बा। एह से जिनगी के देखे के एगो नया नजरिया मिली। बाकि बाद तऽ बाद में होई, पहिले रउआ इ गीत देखीं- 

‘हइसन फूल के हेतना गहँकी 

मुरझा गइला पर के महँकी

 

जगह-जगह पर एकर शोर 

चारो ओर सुनाइल रहे 

अइसन फूल फुलाइल रहे (कि) 

सबके मन ललचाइल रहे 

केतने जाने डाली लगलें 

जहिया ई कोंढ़ियाइल रहे 

केहू माली बनिके पानी दिहल 

जब पत्ता में ई लुकाइल रहे 

केहू भौरा बनिके घूमत रहे 

जहिया ई मुसुकाइल रहे 

जहिये खिलल तहिये मिलल 

अइसन एपर लागल लहकी 

हइसन फूल के... 1


केहू रहि गइल केहू बहि गइल 

केहू कहिया मीली कहि गइल 

केहू हाथ मलि के पछताइल 

कि सगरी पइसा दहि गइल 

केहू उपर गइल केहू नीचे गइल 

केहू सुखले गइल केहू कींचे गइल 

केहू आँखी में बरखा के लेके 

मुरझाइल के सींचे गइल 

केहू छोड़ि दिहल केहू छोरि लिहल 

केहू सगरी डढ़िये झोरि लिहल

केहू सुघर जानि के सूँघ लिहल 

केहू गहराई में बोरि दिहल 

केहू कहेला ह हमार 

त हमरा से ई कहँवा बहकी 

हइसन फूल के... 2


अइसन फूल फूलावल की 

केहू लह‌कि गइल, केहू बहँकि गइल 

जे सुँघि लिहल ह सूघर फूल 

उ सावन अइसन सहकि गइल 

केहू छुवल ह, केहू मुअल ह 

केहू सुसुकि-सुसुकि के रोवल ह 

केहू अइसन फूल के महक खातिर 

सगरी जिनगी खोवल ह

केहू कहेला कि ह हमार 

त हमरी सामने कहिया चहकी 

हइसन फूल के... 3’


समोसा जी के एह रचना के कथ्य जिनगी के क्षणभंगुरता आ माया के आकर्षण के व्यर्थता के इर्द-गिर्द घूमऽता। फूल के जिनगी के प्रतीक बा। जइसे फूल खिलेला, सुगंध बिखेरेला आ फिर मुरझा जाला, ओइसने जिनगी भी क्षणिक बिया। फूल के सुंदरता आ सुगंध के प्रति लोग के लालसा, माया के भ्रामक स्वरूप के प्रतीक बा। कविवर समोसा जी बतावऽतानी कि सांसारिक सुख, जवन फूल के महक जइसन होला, आखिर में खतम हो जाला, बिला जाला आ माया के पीछे भागहुँ वाला के आखिर में खाली पछतावे भेंटाला। संत कवि कबीर के वाणी ‘माया महा ठगनी हम जानी’ से प्रेरित, इ रचना माया के भ्रामक स्वरूप के उजागर तऽ करते बा, साथे-साथे पाठक के आत्म-चिंतनो खातिर प्रेरित करऽतिया। 


समोसा जी के इ रचना तीन खंड में बँटल बिया। जिनगी के अलग-अलग पहलू भा चरण (बचपन से बुढ़ापा तक) के उजागर करऽता। पहिला खंड में फूल के खिले आ एकरे प्रति लोग के आकर्षण के चित्रण भइल बा। फूल के सुंदरता आ सुगंध सबके मन ललचावेला। लोग एके पावे बदे तरह-तरह के कोशिश करे ला—केहू माली बनिके एके सींचे ला, केहू भौरा बनिके एकर इर्द-गिर्द मँडराला। ‘केहू माली बनिके पानी दिहल’ में माली के उपमा ओही लोग खातिर बा, जे सांसारिक सुख के पावे खातिर मेहनत करऽता। ‘केहू भौरा बनिके घूमत रहे’ में भौरा के उपमा ओही लोग खातिर बा, जे सुख के पीछे मँडराता। आखिर में ‘हइसन फूल के हेतना गहँकी / मुरझा गइला पर के महँकी’, इ पंक्ति रचना के केंद्रीय विचार के स्थापित करऽता, जवने के सांसारिक आकर्षण क्षणिक बा।


दोसरा खंड में कविवर समोसा जी फूल के प्रति लोग के किसिम-किसिम के मनोभाव आ एकर नश्वरता के वर्णन करऽतानी। केहू फूल के पावे ला तऽ खुश हो जाला, केहू एके खो भा बिला गइले पर पछताये लागेला, केहू एकरे आकर्षक सुगंध में भौंरा मतिन डूब जाला, तऽ केहू एके ओरवा देला। ‘केहू सगरी पइसा दहि गइल’ में समोसा जी ओइसने लोगिन पऽ तंज कसऽतानी, जे भौतिक सुख खातिर आपन सारा पूँजी गँवा देला। ‘केहू आँखी में बरखा के लेके / मुरझाइल के सींचे गइल’ में करुणा के भाव बा, जवन ओइसन लोग के संकेतक बा जेकरे अंदर करुणा बाटै। एह अंतरा में मानव स्वभाव के जटिलता आ माया के प्रति लिप्सा उजागर भइल बा, जवन लोग के अलग-अलग रूप में प्रभावित करेला।


तीसरा खंड, रचना के चरम बिंदु बा। एहिजा कविवर समोसा जी माया से भरल संसार के उजागर कइले बानी। लोग फूल के महक खातिर आपन पूरा जिनगी खत्म कर देता, बाकिर आखिर में फूल मुरझा जाला। ‘केहू सुसुकि-सुसुकि के रोवल ह’ में मानव जिनगी के असहायता आ दुख के देखावल गइल बा। ‘केहू अइसन फूल के महक खातिर / सगरी जिनगी खोवल ह’ में साफ-सोझ सनेस बा कि सांसारिक सुख के पीछा बिना मतलब के बा। इ अंतरा रचना के आध्यात्मिक आयाम देता। माया से बचे आ सच्चा सुख के खोज करे खातिर प्रेरित करऽता। समोसा जी,  एहिजा आपन दार्शनिक दृष्टिकोण के पूरहर रूप से व्यक्त कइले बानी। इ रचना के एगो आध्यात्मिक चरमोत्कर्ष तक ले जाता।


‘फूल के गहँकी’ के शिल्प भोजपुरी के लोक धारा से प्रेरित बा। संभवत: इहे जनमानस से जुड़ाव के आधार बा। भोजपुरी के खाँटी बोलचाल के शब्द आ मुहावरा, जइसे ‘गहँकी’, ‘लहकी’, ‘चहकी’, ‘सुँघि लिहल’, ‘मुरझाइल’ आदि के उपयोग एहिजा भइल बा। इ एह रचना के जियतार बनावऽता। ‘हइसन फूल के हेतना गहँकी / मुरझा गइला पर के महँकी’ जइसन पंक्ति के पुनरावृत्ति रचना के लय के बान्ह के राखता आ केंद्रीय विचार के बल देता। फूल के जिनगी के प्रतीक बनाके समोसा जी गहन दार्शनिकता के सहजता से पेश कइले बानी। फूल के सुगंध आ सुंदरता माया के प्रतीक बा, जवन क्षणिक बा। इ प्रतीकात्मकता भोजपुरी साहित्य के विस्तार बतावऽता।


समोसा जी के एह रचना के लय लोकगीतन जइसन बा, जवन एकरा के गेय बनावऽता। हर खंड में पंक्ति के संरचना आ लय एक जइसन बा। इ रचना के सुसंगत आ प्रवाहमय बनावऽता। रचना के भावनात्मक गहराई एकर सादगी में छिपल बा। एह रचना में हास्य, करुणा आ आध्यात्मिकता के अनोखा समन्वय बा। फूल के मुरझाइल, जिनगी के क्षणभंगुरता के देखावऽता, इहे रचना के दार्शनिक आधारो बा। मूल सनेस इहे बा कि जिनगी के हर सुख, हर आकर्षण अंत में नष्ट हो जाई। ‘केहू सगरी जिनगी खोवल ह’ में संभवत: अइसने लोगिन पऽ तंज बा कि लोग माया के पीछे आपन पूरा जिनगी बरबाद कर देला। इ गंभीर चिंतन के प्रेरित करऽता। 


असल में इ रचना के आजु के उपभोक्तावादी समाज से सघनता से जुड़ल बा। फूल के सुगंध आ सुंदरता के प्रति लोग के आकर्षण आधुनिक समाज में भौतिक सुख, धन आ सत्ता के पीछे भागे के प्रवृत्ति के प्रतीक बा। सांसारिक सुख के पीछे मनई दौड़ऽता, बाकिर आखिर में उनका खाली पछतावा मिलेला। ‘केहू सगरी पइसा दहि गइल’ आ ‘केहू सगरी जिनगी खोवल ह’ जइसन पंक्ति उपभोक्तावादी समाज पऽ तीखा व्यंग्य बा। साँच मानी तऽ समोसा जी के इ रचना ना खाली साहित्यिक, बलुक सामाजिक आ सांस्कृतिक स्तर पऽ समृद्ध बा। रचना के हर पंक्ति में एगो गहिराह संवेदना बा, जवन पाठक के मरम तक के छूए में सक्षम बा।

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