उमा नेहरू--क्या आप इन्हें जानते हैं? स्वतंत्रता संग्राम और स्त्री और सामाजिक चेतना की अग्रदूत
आगरा में जन्मी, स्वतंत्रता संग्राम की अग्रिम पंक्ति की योद्धा और नेहरू परिवार की सशक्त महिला उमा नेहरू का व्यक्तित्व कर्मठता और बौद्धिकता का अद्भुत संगम था; वे 1920 के असहयोग आंदोलन से ही स्वाधीनता समर में सक्रिय रही थीं । 1930 के आंदोलनों में उन्होंने नमक कानून तोड़ने और नशबंदी के लिए धरना देने जैसे साहसिक कार्यों में अपनी निर्णायक भूमिका निभाई । संसदीय जीवन में, सीतापुर से लोकसभा और राज्यसभा सांसद के रूप में उन्होंने विविध विषयों पर अपनी गंभीर और सुविचारित राय रखकर अपनी अलग पहचान बनाई । उनकी यह विरासत उनकी संतानों में भी परिलक्षित हुई; जहाँ बेटी श्याम कुमारी ने विधि और राजनीति के क्षेत्र में नाम कमाया, वहीं पुत्र आनन्द कुमार और पौत्र अरुण नेहरू ने क्रमशः प्रशासनिक सेवा और 1980 के दशक की राजनीति में अपनी शक्तिशाली उपस्थिति दर्ज कराई ।
महात्मा गांधी से प्रेरित होकर आजादी की लड़ाई में सक्रिय रहने वाली महिलाओं में उमा नेहरू का नाम प्रमुख है। आठ मार्च 1884 को आगरा में निरंजननाथ हुक्कू तथा श्रीमती कैलाश हुक्कू की बेटी के रूप में जन्मी उमा नेहरू की शिक्षा सेंट मेरी कॉनवेंट, हुबली में हुई। 14 फरवरी 1901 में उनका विवाह जवाहरलाल नेहरू के चचेरे भाई श्याम लाल से हुआ। इस तरह से सत्रह वर्ष की आयु में उमा इलाहाबाद के प्रतिष्ठित नेहरू परिवार की सदस्य बन गई।
हरिवंश राय बच्चन ने अपनी आत्मकथा में उमा नेहरू का जिक्र करते हुए लिखा था,
“उमाजी 1920 के असहयोग आंदोलन के समय से ही स्वाधीनता संग्राम में उतरी थीं; इलाहाबाद के काँग्रेसी नेताओं में उनका स्थान तीसरा समझा जाता था। जब मोतीलाल या जवाहरलाल जेल में होते या नगर से बाहर, तब सब प्रकार की राजनीतिक सभाओं का नेतृत्व वे ही करतीं।”
1930 के असहयोग आंदोलन में भी उमा नेहरू की अच्छी-खासी भूमिका रही थी। उन्होंने नमक कानून भंग करने की गतिविधियों में भाग लिया, प्रभात फेरियों का संचालन किया, ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन किए, विदेशी वस्त्रों और शराब की दुकानों की बिक्री को हतोत्साहित करने के लिए दुकानों पर धरने दिए। जब असहयोग आंदोलन करने वाले अधिकांश पुरुष कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हो गई, तब रणनीति के अनुसार महिलाओं ने मोर्चा संभाला। उन्होंने जनपद और प्रांत स्तर पर ‘काँग्रेस डिक्टेटर’ के रूप में काम कर इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। उमा नेहरू ने भी एक ‘डिक्टेटर’ के दायित्व का कार्यभार संभाला और आंदोलन को उपयुक्त दिशा दी।
1932-34 की अवधि में चल रहे सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान उमा नेहरू ने प्रशासन द्वारा लगाई गई निषेधाज्ञा भंग कर जनपदीय सम्मेलन आयोजित किया और गिरफ्तार हुई। इलाहाबाद में 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में उस महत्त्वपूर्ण जनपद से गिरफ्तार होने वाली प्रमुख कार्यकर्ताओं में उमा नेहरू का नाम शीर्ष पर रहा था। अतिरिक्त रूप से वह प्रयाग म्युनिसिपल बोर्ड की सदस्य बनी और वहाँ शिक्षा संबंधी कार्यकलापों की समिति की अध्यक्ष का दायित्व संभाला। वह अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की लखनऊ शाखा की अध्यक्ष के पद पर भी कार्यरत रही। स्वाधीनता पूर्व काल में गठित हुई संयुक्त प्रांत की विधानसभा की उमा नेहरू एक सक्रिय सदस्य थी। यहाँ उन्होंने भारतीय स्वाधीनता संग्राम, स्त्रियों तथा शरणार्थियों से संबंधित अनेक समितियों में सहभागिता की। उनके इस योगदान का उल्लेख इस विधानसभा की कार्यवाहियों में उपयुक्त रूप से अंकित है। वह विधान सभा की प्रवर समिति की सक्रिय सदस्य रही थी।
उनका व्यक्तित्व नारीवाद की प्रखरता से आच्छादित है। उमा नेहरू ने महिलाओं की दशा और दिशा सुधारने के लिए लेखन का भी सहारा लिया। यह वह समय था जब हिंदी में महिला लेखन हाशिए पर था। ‘स्त्री दर्पण’ में विभिन्न सामयिक मुद्दों पर प्रकाशित उनके लेख स्मरणीय हैं। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने एक सांसद के रूप में देश की संसद में महिलाओं के अधिकारों को लेकर आवाज उठाई। इस प्रकार वह एक बहुआयामी महिला थी। वह स्त्रियों की इच्छाओं- आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने के साथ-साथ उनकी गरिमा, सम्मान और अधिकारों के लिए आवाज उठाने में अग्रणी रही।
संयोग से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और उमा की जन्मतिथि एक है, पर संभ्रांत परिवार में जन्म लेने के बावजूद दबी-कुचली महिलाओं की आवाज बुलंद करने वाली उमा नेहरू के विषय में कहीं कोई चर्चा नहीं होती। बतौर सांसद उन्होंने स्त्रियों से जुड़े अनेक विधेयक पारित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1910 से 1935 के बीच प्रकाशित पत्रिका ‘स्त्री दर्पण’ में उनके लेखों में उनके क्रांतिकारी विचारों की बानगी मिलती है। एक उदाहरण,
“मैं पुरुषों के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन पुरुषों की हुकूमत से मैं खूब वाकिफ हूं। चाहे वे काँग्रेस के हों, चाहे सोशलिस्ट के हों और चाहे कम्युनिस्टों के हों, सब पुरुष एक ही होते हैं। दरअसल, औरतों की इक्वेलिटी की बात उनके दिल में भी घर नहीं कर पाई है।”
उमा नेहरू का सांसद के रूप में मई 1959 में लोकसभा में दिए गए भाषण का अंश देखें,
“... मैं अभी चीन होकर आई हूं। वहाँ हमसे छोटे-छोटे हाथ-पैर वाली औरतें बराबर स्टील और लोहे से काम कर रही हैं। बंदूक चलाना मुश्किल काम नहीं है। मैं आपसे कहूंगी कि आपके कैंटोनमेंट्स में जितनी सर्विसेज हैं, महिलाओं के लिए खुलनी चाहिएं।”
एक लेखिका के रूप में उमा नेहरू द्वारा रचिव विविध विषय विस्मित करते हैं। दुख-सुख को लेकर उनकी सोच थी,
“... जहाँ-तहाँ ईश्वर की सृष्टि द्वंद्वों से भरी हुई है। ऐसा मालूम होता है कि परमेश्वर ने अपनी सृष्टि को दो बराबर हिस्सों में विभक्त किया हो। वे द्वन्द्व ये हैं– दुख-सुख, मरना-जीना, राग-द्वेष, तम-प्रकाश, रात-दिन, छोटा-बड़ा, अज्ञान-ज्ञान इत्यादि। जो मनुष्य इन द्वंद्वों से रहित होकर एक अखंड ब्रह्म की भावना में लगा रहता है, उसको समदृष्टि कहते हैं और वही जीवन मुक्त है।”
अछूत जातियों की दशा पर उन्होंने लिखा था,
“हमारी हिन्दू जाति में बहुत-सी बातें ऐसी पैदा हो गई हैं, जिनके सुधार की बहुत जरूरत है। हम जिधर देखते हैं, हमको सैकड़ों ऐसी ही बातें दिखाई पड़ती हैं, यथा बाल विधवा, बाल विवाह, छुआछूत, बिरादरियों के झगड़े इत्यादि। इन सभी बातों ने हिन्दु जाती को कमजोर करके मौत के समीप पहुंचा दिया है, मगर ये सब बातें हमको मनुष्यत्व से इतना नहीं गिरातीं, जितना कि हममें अछूत जातियों का होना और हमारा उनके साथ बर्ताव हमें नीचे गिराता है।”
इस लेख में उन्होंने दावा किया था कि दुनिया की किसी कौम में कोई ऐसी जाति नहीं है, न कभी थी, जिसके लोगों का आपस में मिलना-बोलना या किसी तरह का बर्ताव केवल नीच क्रम ही नहीं, बल्कि सामाजिक पाप समझा जाता हो। खेद से कहना पड़ता है कि यह ‘फख्र’ हमारे हिंदुस्तान को ही हासिल है।
उमा नेहरू का मानना था कि हमारा धर्म दूसरे धर्मों से कहीं बढ़कर हमको यह सिखाता है कि जितने मनुष्य हैं, सबमें एक ही जीव विराजमान है। हमारे वेदान्त और दर्शन में भी कूट-कूट कर भरा है कि संसार की वस्तुओं में जितने भेद पाए जाते हैं, वे सब लोगों के बनाए हुए हैं; और वे केवल उन मनुष्यों के किए हुए हैं जो संसार की और असली चीजों की वास्तविक बात से अनभिज्ञ नहीं हैं। ऐसा धर्म और दर्शन रखते हुए भी उनको शर्म से कहना पड़ता है कि हम इतने गिर गए हैं कि अब हमारी ही जाति में ऐसी बातें पाई जाती हैं , जिनको देख-देख कर संसार हँसता है।
जाति व्यवस्था पर उनका विस्तार से कहना था कि,
“... हमारी जाति पर सबसे भद्दा धब्बा अछूत जातियों का है। अगर हम अपनी पुरानी किताबों को देखते हैं, तो हमको मालूम होता है कि पुराने जमाने में कोई ऐसी जाति न थी, जो हमारी वर्तमान अछूत जातियों से समता रखती हो।
… हम अपनी दशा को देखते हुए पाते हैं कि हममें ऐसी जातियों की कोई इंतिहा ही नहीं है, जिनसे मनुष्यत्व का बर्ताव करना हमारे धर्म के विरुद्ध न हो। पासी, चमार, भंगी, पारिया, पंचामा इत्यादि सब उन बेकुसूर जातियों के नाम हैं, जो बिला किसी अपने कुसूर के हजारों वर्षों से हमारे जुल्म सहती चली आती हैं। शक्ल, सूरत, बदन, ताकत नहीं बल्कि अक्ल में भी, इन फ़िरकों के आदमी किसी हालत में हमसे कम नहीं होते। मगर फिर भी, उनके साथ जानवरों से भी खराब व्यवहार करते हुए हमको शर्म नहीं आती। अगर कोई कुत्ता, गधा या दुनिया का कोई जानवर हमारे कपड़े या बर्तन छू लेता है, तो हम उनको माँज कर इस्तेमाल में ले आते हैं, मगर इन जातियों के इनसान अगर हमारे बर्तन छू लें, तो बिना आग में डाले वे हमारे काम नहीं आ सकते।”
