“ये भी कोई ज़िंदगी है भला?” — रोते हुए आशा भोसले ने गीतकार एस. एच. बिहारी से कहा। बिहारी साहब समझ गए थे कि उनकी आंखों से बहते आंसुओं के पीछे कौन-सा दर्द छिपा है। आज आशा जी को नमन करते हुए जानते हैं उस अमर गीत की कहानी, जो हमेशा याद किया जाएगा जब-जब आशा भोसले और ओ. पी. नय्यर का ज़िक्र होगा।
बात साल 1971 की है। उस समय तक ओ.पी. नय्यर और आशा भोसले का रिश्ता काफ़ी बिगड़ चुका था। दोनों के बीच किसी बात को लेकर गंभीर मतभेद हो गया था। नय्यर साहब के व्यवहार से आशा जी बेहद आहत थीं। उनका मन टूट चुका था, और आंखों में आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।
एक दिन आशा भोसले, गीतकार एस.एच. बिहारी से मिलने पहुंचीं। उन्होंने अपने दिल का सारा दर्द उनके सामने बयां कर दिया। अपनी तकलीफ को कोसते हुए उन्होंने वही शब्द कहे—“ये भी कोई ज़िंदगी है भला?”
बिहारी साहब एक संवेदनशील गीतकार थे। आशा जी की हालत देखकर उनके मन में शब्द खुद-ब-खुद उतरने लगे। उन्होंने तुरंत कलम उठाई और एक शेर लिखा:
“चैन से कभी आपने हमको जीने ना दिया,
ज़हर भी चाहा अगर पीना तो पीने ना दिया।”
कुछ समय बाद यही शेर उन्होंने ओ.पी. नय्यर को सुनाया। नय्यर साहब समझ गए कि यह शेर उन्हीं के बारे में लिखा गया है। उस दर्द को उन्होंने महसूस भी किया और उसी से प्रेरित होकर एक धुन तैयार कर दी।
धुन बनने के बाद एस.एच. बिहारी ने इस शेर को विस्तार देते हुए पूरा गीत रचा। उसी दौर में फिल्मकार एस. अली रज़ा फिल्म प्राण जाए पर वचन ना जाए बना रहे थे, जिसमें रेखा और सुनील दत्त मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म का संगीत ओ.पी. नय्यर के जिम्मे था।
नय्यर साहब ने बिहारी जी का लिखा यह गीत फिल्म में शामिल करवा दिया। और सबसे खास बात—इस गीत को गाने के लिए चुना गया खुद आशा भोसले को। जब आशा जी ने इस गीत को रिकॉर्ड किया, तो उन्होंने अपने दिल के सारे जज़्बात अपनी आवाज़ में उड़ेल दिए। उनकी आवाज़ में दर्द, तड़प और सच्चाई साफ़ महसूस होती थी।
यह गीत आशा भोसले और ओ.पी. नय्यर की मशहूर जोड़ी का आखिरी गीत साबित हुआ। हालांकि गीत को लोगों ने बहुत पसंद किया, लेकिन दुर्भाग्यवश यह फिल्म में शामिल नहीं हो पाया। कुछ लोगों का कहना है कि इसे कभी फिल्माया ही नहीं गया, जबकि कुछ का दावा है कि इसे रेखा पर फिल्माया गया था, मगर बाद में फिल्म से हटा दिया गया।
सच्चाई चाहे जो भी हो, लेकिन यह गीत आज भी यूट्यूब पर उपलब्ध है, जहां आशा भोसले की आवाज़ इस दर्द भरी कहानी को जीवंत कर देती है। फिल्म के म्यूज़िक एल्बम में यह गीत शामिल था, और इसी गीत के लिए आशा जी को फ़िल्मफ़ेयर बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। ओ.पी. नय्यर के साथ चल रहे विवाद के कारण आशा भोसले उस अवॉर्ड समारोह में नहीं पहुंचीं। ऐसे में उनकी ओर से यह अवॉर्ड खुद ओ.पी. नय्यर ने रिसीव किया।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
बताया जाता है कि जब ओ.पी. नय्यर समारोह से लौट रहे थे, तो उन्होंने गुस्से और दर्द में वह ट्रॉफी कार से बाहर फेंक दी। सड़क पर गिरकर उसके टूटने की आवाज़ आई। उस क्षण नय्यर साहब ने कहा—“इसी तरह आशा भोसले ने मेरा दिल भी तोड़ा है।”
उस वक्त गीतकार एस.एच. बिहारी भी उनके साथ कार में मौजूद थे—और शायद उस टूटती ट्रॉफी की आवाज़ में उन्होंने एक रिश्ते के टूटने की गूंज भी सुनी।
