तबहू ना मिले कमल के फूल
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(वैधानिक कारन से एगो मनई क जाति नईखे लिखात, ओहिजा खालि अनु लिखल जाता। निहोरा बा कि ई सैकड़ो बारिस पुरान कथा ह जवना के हमार अउर राउर पुरनिया लोग कहि गइल बा, एसे कहानी पर मन लगावल जा। हमके कवनो केहू के अपमान कइला क मन ना बा। 🙏🙏)
एगो राजा रहन । उनका एगो बेटा एगो बेटी रहे। बेटा के एगो अनु के बेटा से दोस्ती हो गइल। अनु के घर तलाब के भीतर रहे।
राजा के बेटा अनु के बेटा के साथे रोजे जुआ खेलस । एक दिन जुआ खेलत-खेलत अपना बहिन के दाव पर रख देलन आ दाव हार गइलन ।
जब अनुवा क बेटा उनका से उनका बहिन के मंगलस त कहलन कि "तू" तलाब का भीतर से एगो कमल के फूल ऊपर निकलिह, आ हम अपना बहिन के फूल तूड़े खातिर भेजब, तू पीछे घसकत जइह, अइसहीं करत-करत ओकरा के ले लिह ।"
बिहान भइला, तलाब में फूल देख के, राजा के बेटी राजा के बेटा से कहली कि "भइया, हउ फूल तूड़ द ।" त राजा के बेटा कहलन कि "जा तूड़ ले भाव, हम खड़ा बानी।"
राजा के बेटी पानी में ढुकली। तले फूल घसक गइल। ऊ कहली-
"ठेहुन भर पनिया में गइलीं हो भइया । तबहूँ ना मिले कमल के फूल ।"
राजा के बेटा कहले कि-
"बहिनी घुसुकल जो ?"
फेर ऊ डाँढ़ भर पानी में गइली। तले फूल आउर आगे घसक गइल। ऊ कहली-
"डाँड़ भर पानी में गइली हो भइया । तबहूँ ना मिले कमल के फूल।"
राजा क बेटा कहले कि-
"बहिनी घुसुकल जो !"
फेर ई छाती भर पानी में गइली। तले फूल आउर आगे घसक गइल । ऊ कहली -
"छाती भर पनिया में गइली हो भइया ! तबहूं ना मिले कमल के फूल।"
त फेर राजा क बेटा कहले कि-
"बहिनी घुसुकल जो !
तब ऊ आउर आगे, गरदन भर पानी में गइली। तले फूल आउर आगे धसक गइल। ऊ कहली -
"गरदन भर पनिया में गइली हो भइया ! तबहूँ ना मिले कमल के फूल ।"
त फेर राजा क बेटा कहले कि-
"बहिनी घुसुकल जो !"
बस, ऊ आगे बढ़ली, अउरी डूब गइली। भीतर अनु क बेटा इनका के ले जाके अपना घर में रखलस । ऊ जब बाहर जाये लागे त एगो कुतिया के रखवार बइठा जाय ।
एक दिन ई कुतिया से कहली कि
"सुकुल कुत्ती हो ! मोरा नाक के बेसर भले ले लेतू हो ! राजा सुनर घर जाए देतू हो !"
त कुतिया कहलस कि....
"मोरा नाक वा कि पहिरबी ? मोरा नाक वा कि पहिरबी ?"
तब के राजा बेटी कुतिया से कहली कि....
"सुकुल कुत्ती हो । मोरा कान के कुंडल भले ले लेतू हो ! राजा सुनर घर जाए देतू हो !"
कुतिया कहलस कि....
"मोरा कान बा कि पहिरबी ? मोरा कान बा कि पहिरबी?"
फेर राजा के बेटी कहली कि....
"सुकुल कुत्ती हो !" मोरा पाँव के पनहिया भले ले लेतू हो ! राजा सुनर घर जाए देतू हो !"
पनही के नाँव सुनते कुतिया के मुँह में पानी भर गइल। ऊ कहलस कि "द, हम लेब ।"
बस, चट से ई आपन पनही दे देली। कुतिया पनही चाटे-खाए में अझुरा गइल। आ एने राजा के बेटी भाग के राजा के पास अइली । राजा देख के बहुत खुश भइलन । राजा अपनी बिटवा के जुआ में बहिन के दांव पर लगवले के अपराध में देश निकाला क दिहन। आ बिटिया के बियाह खूब धूमधाम से बहुत बड़ राजा से कर देलन । अनु क बेटा के भार झोकवा देन।
